श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एकदासत्प्रसङ्गान्‍निकृतमति१र्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति॥ १३॥ यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति॥ १४॥ क्‍वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं शोकाग्‍निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५॥ क्‍वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसाऽपहृतप्रियतमधनासुःप्रमृतक२ इव विगतजीवलक्षण आस्ते॥ १६॥✎ 942 1533

kvacidāsādya gṛhaṃ dāvavatpriyārthavidhuramasukhodarkaṃ śokāgninā dahyamāno bhṛśaṃ nirvedamupagacchati || 15||

अर्थ

कभी दावानलके समान प्रिय विषयोंसे शून्य एवं परिणाममें दुःखमय घरमें पहुँचता है, तो वहाँ इष्टजनोंके वियोगादिसे उसके शोककी आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्‍न होने लगता है॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मतिर्विदिक्स्रोतःस्वनेन स्खलन०।

    (मुद्रित पृष्ठ 633)
  2. २

    प्रा० पा०—मृत इव।

    (मुद्रित पृष्ठ 633)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #942 शब्दोंके बीचका स्थान: पाखण्डमभियाति॥१३॥ → पाखण्डमभियाति॥ १३॥
  • #1533 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: र्व्युदकस्रोत:- स्खलनवदुभयतोऽपि → र्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि

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