॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.18
कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥ क्वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्निव सीदति॥ १८॥ क्वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः३ स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥ स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥✎ 943
kvacid gṛhāśramakarmacodanātibharagirimārurukṣamāṇo lokavyasanakarṣitamanāḥ kaṇṭakaśarkarākṣetraṃ praviśanniva sīdati|| 18||
अर्थ
गृहस्थाश्रमके लिये जिस कर्मविधिका महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वतकी कड़ी चढ़ाईके समान ही है। लोगोंको उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करनेका प्रयत्न करता है, तब तरह-तरहकी कठिनाइयोंसे क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ोंसे भरी भूमिमें पहुँचे हुए व्यक्तिके समान दुःखी हो जाता है॥ १८॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।