श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥ क्‍वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्‍निव सीदति॥ १८॥ क्‍वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः३ स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥ स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥✎ 943

sa eva punarnidrājagaragṛhīto'ndhe tamasi magnaḥ śūnyāraṇya iva śete nānyat kiñcana veda śava ivāpaviddhaḥ|| 20||

अर्थ

फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है। उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।

    (मुद्रित पृष्ठ 633)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #943 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥१७॥ → स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥

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