sa eva punarnidrājagaragṛhīto'ndhe tamasi magnaḥ śūnyāraṇya iva śete nānyat kiñcana veda śava ivāpaviddhaḥ|| 20||
अर्थ
फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है। उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती॥ २०॥
स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥
फिर जब निद्रारूप अजगरके चंगुलमें फँस जाता है, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें डूबकर सूने वनमें फेंके हुए मुर्देके समान सोया पड़ा रहता है। उस समय इसे किसी बातकी सुधि नहीं रहती॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 633) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/14/20/