कभी परस्पर लेन-देनका व्यवहार करते समय किसी दूसरेका थोड़ा सा—दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानीके कारण उससे वैर ठन जाता है॥ २६॥
क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमन्येभ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात्॥ २६॥
कभी परस्पर लेन-देनका व्यवहार करते समय किसी दूसरेका थोड़ा सा—दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानीके कारण उससे वैर ठन जाता है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 634) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/14/26/