॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.36
क्वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोगविहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादानेऽवसितमतिस्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥ ३६॥
kvacitkṣīṇadhanaḥ śayyāsanāśanādyupabhogavihīno yāvadapratilabdhamanorathopagatādāne'vasitamatistatastato'vamānādīni janādabhilabhate || 36||
अर्थ
कभी धन नष्ट हो जानेसे जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदिकी भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलनेसे यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायोंसे पानेका निश्चय करता है। इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरोंके हाथसे बहुत अपमानित होना पड़ता है॥ ३६॥