॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.46
य इदं भागवतसभाजितावदातगुणकर्मणो राजर्षेर्भरतस्यानुचरितं स्वस्त्ययनमायुष्यं धन्यं यशस्यं स्वर्ग्यापवर्ग्यं वानुशृणोति आख्यास्यति अभिनन्दति च सर्वा एवाशिष आत्मन आशास्ते न काञ्चन परत इति॥ ४६॥
ya idaṃ bhāgavatasabhājitāvadātaguṇakarmaṇo rājarṣerbharatasyānucaritaṃ svastyayanamāyuṣyaṃ dhanyaṃ yaśasyaṃ svargyāpavargyaṃ vānuśṛṇoti ākhyāsyati abhinandati ca sarvā evāśiṣa ātmana āśāste na kāñcana parata iti|| 46||
अर्थ
राजन्! राजर्षि भरतके पवित्र गुण और कर्मोंकी भक्तजन भी प्रशंसा करते हैं। उनका यह चरित्र बड़ा कल्याणकारी, आयु और धनकी वृद्धि करनेवाला, लोकमें सुयश बढ़ानेवाला और अन्तमें स्वर्ग तथा मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जो पुरुष इसे सुनता या सुनाता है और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी सारी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं; दूसरोंसे उसे कुछ भी नहीं माँगना पड़ता॥ ४६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतोपाख्याने
पारोक्ष्यविवरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥