श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

छन्दांस्यकामस्य च यस्य कामान्

दुदूहुराजह्रुरथो बलिं नृपाः।

प्रत्यञ्चिता युधि धर्मेण विप्रा ✎ 1056

यदाशिषां षष्ठमंशं परेत्य॥ ११

chandāṃsyakāmasya ca yasya kāmān

dudūhurājahruratho baliṃ nṛpāḥ|

pratyañcitā yudhi dharmeṇa viprā

yadāśiṣāṃ ṣaṣṭhamaṃśaṃ paretya|| 11

अर्थ

उन्हें कोई कामना न थी, तब भी वेदोक्त कर्मोंने उनको सब प्रकारके भोग दिये, राजाओंने युद्धस्थलमें उनके बाणोंसे सत्कृत होकर नाना प्रकारकी भेंटें दीं तथा ब्राह्मणोंने दक्षिणादि धर्मसे सन्तुष्ट होकर उन्हें परलोकमें मिलनेवाले अपने धर्मफलका छठा अंश दिया॥ ११॥✎ 453 454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #453 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,तथा → थे, तथा
  • #454 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1056 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रत्यंञ्च‌िता → प्रत्यञ्चिता

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