श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

मन्दरोत्सङ्ग एकादशशतयोजनोत्तुङ्गदेवचूतशिरसो गिरिशिखरस्थूलानि फलान्यमृतकल्पानि पतन्ति॥ १६॥ तेषां विशीर्यमाणानामतिमधुरसुरभिसुगन्धिबहुलारुणरसोदेनारुणोदा नाम नदी मन्दरगिरिशिखरान्‍निपतन्ती पूर्वेणेलावृतमुपप्लावयति॥ १७॥ यदुपजोषणाद्भवान्या अनुचरीणां पुण्यजनवधूनामवयवस्पर्शसुगन्धवातो दशयोजनं समन्तादनुवासयति॥ १८॥ एवं जम्बूफलानामत्युच्चनिपातविशीर्णानाम् अनस्थिप्रायाणामिभकायनिभानां रसेन जम्बू नाम नदी मेरुमन्दरशिखरादयुतयोजनादवनितले निपतन्ती दक्षिणेनात्मानं यावदिलावृतमुपस्यन्दयति ॥ १९॥ तावदुभयोरपि रोधसोर्या मृत्तिका तद्रसेनानुविध्यमाना वाय्वर्कसंयोगविपाकेन सदामरलोकाभरणं जाम्बूनदं नाम सुवर्णं भवति॥ २०॥ यदु ह वाव विबुधादयः सह युवतिभिर्मुकुटकटककटिसूत्राद्याभरणरूपेण खलु धारयन्ति॥ २१॥✎ 946 1057

tāvadubhayorapi rodhasoryā mṛttikā tadrasenānuvidhyamānā vāyvarkasaṃyogavipākena sadāmaralokābharaṇaṃ jāmbūnadaṃ nāma suvarṇaṃ bhavati|| 20||

अर्थ

उस नदीके दोनों किनारोंकी मिट्टी उस रससे भीगकर जब वायु और सूर्यके संयोगसे सूख जाती है, तब वही देवलोकको विभूषित करनेवाला जाम्बूनद नामका सोना बन जाती है॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #946 शब्दोंके बीचका स्थान: समन्तादनुवासयति॥१८॥ → समन्तादनुवासयति॥ १८॥
  • #1057 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अनस्थिप्रायाणामिभकाय-निभानां → अनस्थिप्रायाणामिभकायनिभानां

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