श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नवस्वपि वर्षेषु भगवान्‍नारायणो महापुरुषः पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि३ संनिधीयते॥ १४॥ इलावृते तु भगवान् भव एक एव पुमान्‍न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्याः शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतः स्त्रीभावस्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि४ ॥ १५॥ भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो५ भगवतश्‍चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण संनिधाप्यैतदभिगृणन् भव उपधावति॥ १६॥

bhavānīnāthaiḥ strīgaṇārbudasahasrairavarudhyamāno bhagavataścaturmūrtermahāpuruṣasya turīyāṃ tāmasīṃ mūrtiṃ prakṛtimātmanaḥ saṅkarṣaṇasaṃjñāmātmasamādhirūpeṇa saṃnidhāpyaitadabhigṛṇan bhava upadhāvati|| 16||

अर्थ

वहाँ पार्वती एवं उनकी अरबों-खरबों दासियोंसे सेवित भगवान् शंकर परम पुरुष परमात्माकी वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षणसंज्ञक चतुर्व्यूह-मूर्तियोंमेंसे अपनी कारणरूपा संकर्षण नामकी तमःप्रधान चौथी मूर्तिका ध्यानस्थित मनोमय विग्रहके रूपमें चिन्तन करते हैं और इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं*॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—व्यूहैरात्मनाद्यापि।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)
  2. ४

    प्रा० पा०—पश्चाद्वक्ष्यामः।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)
  3. ५

    प्रा० पा०—सहस्रैर्व्यवरुद्ध्ययमानो।

    (मुद्रित पृष्ठ 647)
  4. *

    भगवान्का विग्रह शुद्ध चिन्मय ही है परन्तु संहार आदि तामसी कार्योंका हेतु होनेसे इसे तामसी मूर्ति कहते हैं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 647)

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