॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.10
मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु
सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः।
यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान्
सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः॥ १०
māgāradārātmajavittabandhuṣu
saṅgo yadi syādbhagavatpriyeṣu naḥ|
yaḥ prāṇavṛttyā parituṣṭa ātmavān
siddhyatyadūrānna tathendriyapriyaḥ|| 10
अर्थ
प्रभो! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओंमें हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें ही। जो संयमी पुरुष केवल शरीर-निर्वाहके योग्य अन्नादिसे सन्तुष्ट रहता है, उसे जितनी शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रियलोलुप पुरुषको नहीं होती॥ १०॥✎ 1612