श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताहःसु च तद्भर्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति॥ १७॥

tadbhagavato māyāmayaṃ rūpaṃ paramasamādhiyogena ramādevī saṃvatsarasya rātriṣu prajāpaterduhitṛbhirupetāhaḥsu ca tadbhartṛbhirupāste idaṃ codāharati|| 17||

अर्थ

श्रीलक्ष्मीजी परम समाधियोगके द्वारा भगवान्‌के उस मायामय स्वरूपकी रात्रिके समय प्रजापति संवत्सरकी कन्याओंसहित और दिनमें उनके पतियोंके सहित आराधना और वे इस मन्त्रका जप करती हुई भगवान्‌की स्तुति करती हैं॥ १७॥✎ 459 1613

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #459 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1613 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काम-देवको → कामदेवको

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