श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स्त्रियो व्रतैस्त्वा हृषिकेश्‍वरं स्वतो

ह्याराध्य लोके पतिमाशासतेऽन्यम्।

तासां न ते वै परिपान्त्यपत्यं

प्रियं धनायूंषि यतोऽस्वतन्त्राः॥ १९

striyo vrataistvā hṛṣikeśvaraṃ svato

hyārādhya loke patimāśāsate'nyam|

tāsāṃ na te vai paripāntyapatyaṃ

priyaṃ dhanāyūṃṣi yato'svatantrāḥ|| 19

अर्थ

‘भगवन्! आप इन्द्रियोंके अधीश्‍वर हैं। स्त्रियाँ तरह-तरहके कठोर व्रतोंसे आपकी ही आराधना करके अन्य लौकिक पतियोंकी इच्छा किया करती हैं। किन्तु वे उनके प्रिय पुत्र, धन और आयुकी रक्षा नहीं कर सकते; क्योंकि वे स्वयं ही परतन्त्र हैं॥ १९॥

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