श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.24

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

रम्यके च भगवतः प्रियतमं मात्स्यमवताररूपं तद्वर्षपुरुषस्य मनोः प्राक्प्रदर्शितं स इदानीमपि महता भक्तियोगेनाराधयतीदं चोदाहरति॥ २४॥ ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सत्त्वाय प्राणायौजसे सहसे बलाय महामत्स्याय नम इति॥ २५॥

ramyake ca bhagavataḥ priyatamaṃ mātsyamavatārarūpaṃ tadvarṣapuruṣasya manoḥ prākpradarśitaṃ sa idānīmapi mahatā bhaktiyogenārādhayatīdaṃ codāharati|| 24||

अर्थ

रम्यकवर्षमें भगवान्‌ने वहाँके अधिपति मनुको पूर्वकालमें अपना परम प्रिय मत्स्यरूप दिखाया था। मनुजी इस समय भी भगवान्‌के उसी रूपकी बड़े भक्तिभावसे उपासना करते हैं और इस मन्त्रका जप करते हुए स्तुति करते हैं—‘सत्त्वप्रधान मुख्य प्राण सूत्रात्मा तथा मनोबल, इन्द्रियबल और शरीरबल ओंकारपदके अर्थ सर्वश्रेष्ठ भगवान् महामत्स्यको बार-बार नमस्कार है’॥ २४-२५॥✎ 460

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #460 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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