प्रभो! नट जिस प्रकार कठपुतलियोंको नचाता है, उसी प्रकार आप ब्राह्मणादि नामोंकी डोरीसे सम्पूर्ण विश्वको अपने अधीन करके नचा रहे हैं। अतः आप ही सबके प्रेरक हैं। आपको ब्रह्मादि लोकपालगण भी नहीं देख सकते; तथापि आप समस्त प्राणियोंके भीतर प्राणरूपसे और बाहर वायु-रूपसे निरन्तर संचार करते रहते हैं। वेद ही आपका महान् शब्द है॥ २६॥
अन्तर्बहिश्चाखिललोकपालकै-
रदृष्टरूपो विचरस्युरुस्वनः।
स ईश्वरस्त्वं य इदं वशेऽनय-
न्नाम्ना यथा दारुमयीं नरः स्त्रियम्॥ २६
प्रभो! नट जिस प्रकार कठपुतलियोंको नचाता है, उसी प्रकार आप ब्राह्मणादि नामोंकी डोरीसे सम्पूर्ण विश्वको अपने अधीन करके नचा रहे हैं। अतः आप ही सबके प्रेरक हैं। आपको ब्रह्मादि लोकपालगण भी नहीं देख सकते; तथापि आप समस्त प्राणियोंके भीतर प्राणरूपसे और बाहर वायु-रूपसे निरन्तर संचार करते रहते हैं। वेद ही आपका महान् शब्द है॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 653) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/18/26/