श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.29

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

हिरण्मयेऽपि भगवान्‍निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषैः पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति॥ २९॥

hiraṇmaye'pi bhagavānnivasati kūrmatanuṃ bibhrāṇastasya tatpriyatamāṃ tanumaryamā saha varṣapuruṣaiḥ pitṛgaṇādhipatirupadhāvati mantramimaṃ cānujapati|| 29||

अर्थ

हिरण्मयवर्षमें भगवान् कच्छपरूप धारण करके रहते हैं। वहाँके निवासियोंके सहित पितृराज अर्यमा भगवान्‌की उस प्रियतम मूर्तिकी उपासना करते हैं और इस मन्त्रको निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं॥ २९॥✎ 461 1356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #461 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1356 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ओेंकारस्वरूप → ओंकारस्वरूप

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