हिरण्मयवर्षमें भगवान् कच्छपरूप धारण करके रहते हैं। वहाँके निवासियोंके सहित पितृराज अर्यमा भगवान्की उस प्रियतम मूर्तिकी उपासना करते हैं और इस मन्त्रको निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं॥ २९॥✎ 4611356
हिरण्मयेऽपि भगवान्निवसति कूर्मतनुं बिभ्राणस्तस्य तत्प्रियतमां तनुमर्यमा सह वर्षपुरुषैः पितृगणाधिपतिरुपधावति मन्त्रमिमं चानुजपति॥ २९॥
हिरण्मयवर्षमें भगवान् कच्छपरूप धारण करके रहते हैं। वहाँके निवासियोंके सहित पितृराज अर्यमा भगवान्की उस प्रियतम मूर्तिकी उपासना करते हैं और इस मन्त्रको निरन्तर जपते हुए स्तुति करते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 654) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/18/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)