श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ॐ नमो भगवते उपशमशीलाय उपरतानात्म्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे१ आत्मारामाधिपतये नमो नम इति॥ ११॥✎ 950

oṃ namo bhagavate upaśamaśīlāya uparatānātmyāya namo'kiñcanavittāya ṛṣiṛṣabhāya naranārāyaṇāya paramahaṃsaparamagurave ātmārāmādhipataye namo nama iti|| 11||

अर्थ

—‘ओंकारस्वरूप, अहंकारसे रहित, निर्धनोंके धन, शान्तस्वभाव ऋषिप्रवर भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है। वे परमहंसोंके परम गुरु और आत्मारामोंके अधीश्‍वर हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परमगुरुवरायात्मारामा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 658)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #950 शब्दोंके बीचका स्थान: परमहंसपरमगुरवेआत्मारामाधिपतये → परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये

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