॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.14
यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः
सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्।
शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद्
यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम्॥ १४
yathaihikāmuṣmikakāmalampaṭaḥ
suteṣu dāreṣu dhaneṣu cintayan|
śaṅketa vidvān kukalevarātyayād
yastasya yatnaḥ śrama eva kevalam|| 14
अर्थ
लौकिक और पारलौकिक भोगोंके लालची मूढ पुरुष जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करके मौतसे डरते हैं—उसी प्रकार यदि विद्वान्को भी इस निन्दनीय शरीरके छूटनेका भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है॥ १४॥