श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति॥ १७॥ चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्‍च नदौ महानदी वेदस्मृतिर्ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रूश्‍चन्द्रभागा मरुद‍्वृधा वितस्ता असिक्‍नी विश्वेति महानद्यः॥ १८॥ अस्मिन्‍नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्व्य आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति॥ १९॥ योऽसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने परमात्मनि वासुदेवेऽनन्यनिमित्तभक्तियोगलक्षणो नानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धनद्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसङ्गः॥ २०॥✎ 1061 1062 2015

etāsāmapo bhāratyaḥ prajā nāmabhireva punantīnāmātmanā copaspṛśanti|| 17||

अर्थ

ये नदियाँ अपने नामोंसे ही जीवको पवित्र कर देती हैं और भारतीय प्रजा इन्हींके जलमें स्नानादि करती है॥ १७॥✎ 462 463

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #462 शब्दोंके बीचका स्थान: इसवर्षमें → इस वर्षमें
  • #463 शब्दोंके बीचका स्थान: कृष्णा,वेण्या, → कृष्णा, वेण्या,
  • #1061 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वेदस्मृतिऋर्षिकुल्या → वेदस्मृतिऋर्ऋषिकुल्या
  • #1062 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वेदस्मृतिऋर्ऋषिकुल्या → वेदस्मृतिर्ऋषिकुल्या
  • #2015 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): यो बह्वॺ आत्म → यो बह्व्य आत्म

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