श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात्

क्षणायुषां भारतभूजयो वरम्।

क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः

संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः॥ २३

kalpāyuṣāṃ sthānajayātpunarbhavāt

kṣaṇāyuṣāṃ bhāratabhūjayo varam|

kṣaṇena martyena kṛtaṃ manasvinaḥ

saṃnyasya saṃyāntyabhayaṃ padaṃ hareḥ|| 23

अर्थ

यह स्वर्ग तो क्या—जहाँके निवासियोंकी एक-एक कल्पकी आयु होती है किन्तु जहाँसे फिर संसारचक्रमें लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादिकी अपेक्षा भी भारतभूमिमें थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्यशरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान्‌को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है॥ २३॥✎ 465

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #465 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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