॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.26
यैः श्रद्धया बर्हिषि भागशो हवि-
र्निरुप्तमिष्टं विधिमन्त्रवस्तुतः।
एकः पृथङ्नामभिराहुतो मुदा
गृह्णाति पूर्णः स्वयमाशिषां प्रभुः॥ २६
yaiḥ śraddhayā barhiṣi bhāgaśo havi-
rniruptamiṣṭaṃ vidhimantravastutaḥ|
ekaḥ pṛthaṅnāmabhirāhuto mudā
gṛhṇāti pūrṇaḥ svayamāśiṣāṃ prabhuḥ|| 26
अर्थ
अहो! इन भारतवासियोंका कैसा सौभाग्य है! जब ये यज्ञमें भिन्न-भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे अलग-अलग भाग रखकर विधि, मन्त्र और द्रव्यादिके योगसे श्रद्धापूर्वक उन्हें हवि प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार इन्द्रादि भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारे जानेपर सम्पूर्ण कामनाओंके पूर्ण करनेवाले स्वयं पूर्णकाम श्रीहरि ही प्रसन्न होकर उस हविको ग्रहण करते हैं॥ २६॥✎ 1809