श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.28

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं१

स्विष्टस्य सूक्तस्य कृतस्य शोभनम्।

तेनाजनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्याद्

वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति॥ २८

yadyatra naḥ svargasukhāvaśeṣitaṃ

sviṣṭasya sūktasya kṛtasya śobhanam|

tenājanābhe smṛtimajjanma naḥ syād

varṣe hariryadbhajatāṃ śaṃ tanoti|| 28

अर्थ

अतः अबतक स्वर्गसुख भोग लेनेके बाद हमारे पूर्वकृत यज्ञ, प्रवचन और शुभ कर्मोंसे यदि कुछ भी पुण्य बचा हो, तो उसके प्रभावसे हमें इस भारतवर्षमें भगवान्‌की स्मृतिसे युक्त मनुष्यजन्म मिले; क्योंकि श्रीहरि अपना भजन करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण करते हैं’॥ २८॥✎ 466

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सृज्यसुखा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 661)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #466 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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