श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.31

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

जम्बूद्वीपस्य च राजन्‍नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भिरुपकल्पितान्॥ २९॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्‍चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणः२ पाञ्चजन्यः सिंहलो लङ्केति॥ ३०॥ एवं तव भारतोत्तम जम्बूद्वीपवर्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति॥ ३१॥

evaṃ tava bhāratottama jambūdvīpavarṣavibhāgo yathopadeśamupavarṇita iti|| 31||

अर्थ

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जैसा मैंने गुरुमुखसे सुना था, ठीक वैसा ही तुम्हें यह जम्बूद्वीपके वर्षोंका विभाग सुना दिया॥ ३१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मन्दहरिणो।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 661)

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