॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.7
न जन्म नूनं महतो न सौभगं
न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः।
तैर्यद्विसृष्टानपि१ नो वनौकस-
श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः॥ ७
na janma nūnaṃ mahato na saubhagaṃ
na vāṅ na buddhirnākṛtistoṣahetuḥ|
tairyadvisṛṣṭānapi no vanaukasa-
ścakāra sakhye bata lakṣmaṇāgrajaḥ|| 7
अर्थ
आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षाके लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज! उत्तम कुलमें जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि—इनमेंसे कोई भी गुण आपकी प्रसन्नताका कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखानेके लिये ही आपने इन सब गुणोंसे रहित हम वनवासी वानरोंसे मित्रता की है॥ ७॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सृष्टान्विपिने।