॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.2.14
योऽसौ त्वया करसरोजहतः पतङ्गो
दिक्षु भ्रमन् भ्रमत एजयतेऽक्षिणी मे३।
मुक्तं न ते स्मरसि वक्रजटावरूथं
कष्टोऽनिलो हरति लम्पट एष नीवीम्॥ १४
yo'sau tvayā karasarojahataḥ pataṅgo
dikṣu bhraman bhramata ejayate'kṣiṇī me|
muktaṃ na te smarasi vakrajaṭāvarūthaṃ
kaṣṭo'nilo harati lampaṭa eṣa nīvīm|| 14
अर्थ
तुम जब अपने करकमलोंसे थपकी मारकर इस गेंदको उछालते हो, तब यह दिशा-विदिशाओंमें जाती हुई मेरे नेत्रोंको तो चंचल कर ही देती है, साथ-साथ मेरे मनमें भी खलबली पैदा कर देती है। तुम्हारा बाँका जटाजूट खुल गया है, तुम इसे सँभालते नहीं? अरे, यह धूर्त वायु कैसा दुष्ट है जो बार-बार तुम्हारे नीवी-वस्त्रको उड़ा देता है॥ १४॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—ते।