॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.2.16
न त्वां त्यजामि दयितं६ द्विजदेवदत्तं
यस्मिन्मनो दृगपि नो न वियाति लग्नम्।
मां चारुशृङ्ग्यर्हसि नेतुमनुव्रतं ते
चित्तं यतः प्रतिसरन्तु शिवाः सचिव्यः॥ १६
na tvāṃ tyajāmi dayitaṃ dvijadevadattaṃ
yasminmano dṛgapi no na viyāti lagnam|
māṃ cāruśṛṅgyarhasi netumanuvrataṃ te
cittaṃ yataḥ pratisarantu śivāḥ sacivyaḥ|| 16
अर्थ
सचमुच, तुम ब्रह्माजीकी ही प्यारी देन हो; अब मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता। तुममें तो मेरे मन और नयन ऐसे उलझ गये हैं कि अन्यत्र जाना ही नहीं चाहते। सुन्दर सींगोंवाली! तुम्हारा जहाँ मन हो, मुझे भी वहीं ले चलो; मैं तो तुम्हारा अनुचर हूँ और तुम्हारी ये मंगलमयी सखियाँ भी हमारे ही साथ रहें’॥ १६॥
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प्रा० पा०—दयितां।