श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति ललनानुनयातिविशारदो ग्राम्यवैदग्ध्यया परिभाषया तां विबुधवधूं विबुधमतिरधिसभाजयामास॥ १७॥ सा च ततस्तस्य वीरयूथपतेर्बुद्धिशीलरूपवयःश्रियौदार्येण पराक्षिप्तमनास्तेन सहायुतायुतपरिवत्सरोपलक्षणं कालं जम्बूद्वीपपतिना भौमस्वर्गभोगान् बुभुजे॥ १८॥ तस्यामु ह वा आत्मजान् स राजवर आग्नीध्रो नाभिकिम्पुरुषहरिवर्षेलावृतरम्यकहिरण्मयकुरुभद्राश्‍वकेतुमालसंज्ञान्‍नव पुत्रानजनयत्॥ १९॥

tasyāmu ha vā ātmajān sa rājavara āgnīdhro nābhikimpuruṣaharivarṣelāvṛtaramyakahiraṇmayakurubhadrāśvaketumālasaṃjñānnava putrānajanayat|| 19||

अर्थ

तदनन्तर नृपवर आग्नीध्रने उसके गर्भसे नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्‍व और केतुमाल नामके नौ पुत्र उत्पन्‍न किये॥ १९॥

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