महाराज आग्नीध्र दिन-दिन भोगोंको भोगते रहनेपर भी उनसे अतृप्त ही रहे। वे उस अप्सराको ही परम पुरुषार्थ समझते थे। इसलिये उन्होंने वैदिक कर्मोंके द्वारा उसी लोकको प्राप्त किया, जहाँ पितृगण अपने सुकृतोंके अनुसार तरह-तरहके भोगोंमें मस्त रहते हैं॥ २२॥
आग्नीध्रो राजातृप्तः कामानामप्सरसमेवानुदिनमधिमन्यमानस्तस्याः सलोकतां श्रुतिभिरवारुन्ध यत्र पितरो मादयन्ते॥ २२॥
महाराज आग्नीध्र दिन-दिन भोगोंको भोगते रहनेपर भी उनसे अतृप्त ही रहे। वे उस अप्सराको ही परम पुरुषार्थ समझते थे। इसलिये उन्होंने वैदिक कर्मोंके द्वारा उसी लोकको प्राप्त किया, जहाँ पितृगण अपने सुकृतोंके अनुसार तरह-तरहके भोगोंमें मस्त रहते हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.2.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 586) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/2/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1045 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेरुदुहितृर्मेरुदेवीं → मेरुदुहितॄर्मेरुदेवीं