श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

परस्य ब्रह्मणः साक्षाज्जातवेदोऽसि हव्यवाट्।

देवानां पुरुषाङ्गानां यज्ञेन पुरुषं यजेति॥ १७॥

parasya brahmaṇaḥ sākṣājjātavedo'si havyavāṭ|

devānāṃ puruṣāṅgānāṃ yajñena puruṣaṃ yajeti|| 17||

अर्थ

(तथा इस प्रकार स्तुति करते हैं—) ‘अग्ने! आप परब्रह्मको साक्षात् हवि पहुँचानेवाले हैं; अतः भगवान्‌के अंगभूत देवताओंके यजनद्वारा आप उन परमपुरुषका ही यजन करें’॥ १७॥

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