॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.20.23
आपः पुरुषवीर्याः स्थ पुनन्तीर्भूर्भुवः सुवः।
ता नः पुनीतामीवघ्नीः स्पृशतामात्मना भुव इति ॥ २३॥
āpaḥ puruṣavīryāḥ stha punantīrbhūrbhuvaḥ suvaḥ|
tā naḥ punītāmīvaghnīḥ spṛśatāmātmanā bhuva iti || 23||
अर्थ
(और कहते हैं—) ‘हे जलके देवता! तुम्हें परमात्मासे सामर्थ्य प्राप्त है। तुम भूः, भुवः और स्वः—तीनों लोकोंको पवित्र करते हो; क्योंकि स्वरूपसे ही पापोंका नाश करनेवाले हो। हम अपने शरीरसे तुम्हारा स्पर्श करते हैं, तुम हमारे अंगोंको पवित्र करो’॥ २३॥