श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

आपः पुरुषवीर्याः स्थ पुनन्तीर्भूर्भुवः सुवः।

ता नः पुनीतामीवघ्नीः स्पृशतामात्मना भुव इति ॥ २३॥

āpaḥ puruṣavīryāḥ stha punantīrbhūrbhuvaḥ suvaḥ|

tā naḥ punītāmīvaghnīḥ spṛśatāmātmanā bhuva iti || 23||

अर्थ

(और कहते हैं—) ‘हे जलके देवता! तुम्हें परमात्मासे सामर्थ्य प्राप्त है। तुम भूः, भुवः और स्वः—तीनों लोकोंको पवित्र करते हो; क्योंकि स्वरूपसे ही पापोंका नाश करनेवाले हो। हम अपने शरीरसे तुम्हारा स्पर्श करते हैं, तुम हमारे अंगोंको पवित्र करो’॥ २३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें