अन्तर्यामीश्वरः साक्षात्पातु नो यद्वशे स्फुटम्॥ २८
antaḥ praviśya bhūtāni yo bibhartyātmaketubhiḥ|
antaryāmīśvaraḥ sākṣātpātu no yadvaśe sphuṭam|| 28
अर्थ
(और इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं—) ‘जो प्राणादि वृत्तिरूप अपनी ध्वजाओंके सहित प्राणियोंके भीतर प्रवेश करके उनका पालन करते हैं तथा सम्पूर्ण दृश्य जगत् जिनके अधीन है, वे साक्षात् अन्तर्यामी वायुभगवान् हमारी रक्षा करें’॥ २८॥
अन्तः प्रविश्य भूतानि यो बिभर्त्यात्मकेतुभिः।
अन्तर्यामीश्वरः साक्षात्पातु नो यद्वशे स्फुटम्॥ २८
(और इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं—) ‘जो प्राणादि वृत्तिरूप अपनी ध्वजाओंके सहित प्राणियोंके भीतर प्रवेश करके उनका पालन करते हैं तथा सम्पूर्ण दृश्य जगत् जिनके अधीन है, वे साक्षात् अन्तर्यामी वायुभगवान् हमारी रक्षा करें’॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 666) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/28/