श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.39

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

एतावाल्‍ँलोकविन्यासो मानलक्षणसंस्थाभिर्विचिन्तितः कविभिः स तु पञ्चाशत्कोटिगणितस्य भूगोलस्य १तुरीयभागोऽयं लोकालोकाचलः॥ ३८॥ तदुपरिष्टाच्चतसृष्वाशास्वात्मयोनिनाखिलजगद‍्गुरुणाधिनिवेशिता२ ये द्विरदपतय ऋषभः पुष्करचूडो वामनोऽपराजित इति सकललोकस्थितिहेतवः॥ ३९॥ तेषां स्वविभूतीनां लोकपालानां च विविधवीर्योपबृंहणाय भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिरन्तर्याम्यात्मनो विशुद्धसत्त्वं धर्मज्ञानवैराग्यैश्‍वर्याद्यष्टमहासिद्ध्युपलक्षणं विष्वक‍्सेनादिभिःस्वपार्षदप्रवरैः परिवारितो निजवरायुधोपशोभितैर्निजभुजदण्डैः३ सन्धारयमाणस्तस्मिन् गिरिवरे समन्तात्सकललोकस्वस्तय आस्ते॥ ४०॥✎ 1869

tadupariṣṭāccatasṛṣvāśāsvātmayoninākhilajagadguruṇādhiniveśitā ye dviradapataya ṛṣabhaḥ puṣkaracūḍo vāmano'parājita iti sakalalokasthitihetavaḥ|| 39||

अर्थ

इसके ऊपर चारों दिशाओंमें समस्त संसारके गुरु स्वयम्भू श्रीब्रह्माजीने सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये ऋषभ, पुष्करचूड, वामन और अपराजित नामके चार गजराज नियुक्त किये हैं॥ ३९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—भूगोलकस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 667)
  2. २

    प्रा० पा०—भिनिवेशिता।

    (मुद्रित पृष्ठ 667)
  3. ३

    प्रा० पा०—भितैर्भुजदण्डैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 667)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1869 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): भूगोलस्यतुरीय → भूगोलस्य तुरीय

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