इस प्रकार अपनी योगमायासे रचे हुए विविध लोकोंकी व्यवस्थाको सुरक्षित रखनेके लिये वे इसी लीलामयरूपसे कल्पके अन्ततक वहाँ सब ओर रहते हैं॥ ४१॥
आकल्पमेवं वेषं गत एष भगवानात्मयोगमायया विरचितविविधलोकयात्रागोपीथायेत्यर्थः॥ ४१॥
इस प्रकार अपनी योगमायासे रचे हुए विविध लोकोंकी व्यवस्थाको सुरक्षित रखनेके लिये वे इसी लीलामयरूपसे कल्पके अन्ततक वहाँ सब ओर रहते हैं॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 668) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/41/