श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.21.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

यन्मध्यगतो भगवांस्तपताम्पतिस्तपन आतपेन त्रिलोकीं प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा स एष उदगयनदक्षिणायनवैषुवतसंज्ञाभिर्मान्द्यशैघ्र्यसमानाभिर्गतिभिरारोहणावरोहणसमानस्थानेषु यथासवनमभिपद्यमानो मकरादिषु राशिष्वहोरात्राणि दीर्घह्रस्वसमानानि विधत्ते॥ ३॥ यदा मेषतुलयोर्वर्तते तदाहोरात्राणि समानानि भवन्ति यदा वृषभादिषु१ पञ्चसु च राशिषु चरति तदाहान्येव वर्धन्ते२ ह्रसति च मासि मास्येकैका घटिका रात्रिषु॥ ४॥ यदा वृश्चिकादिषु पञ्चसु वर्तते तदाहोरात्राणि विपर्ययाणि भवन्ति॥ ५॥ यावद्दक्षिणायनमहानि वर्धन्ते यावदुदगयनं रात्रयः॥ ६॥

yāvaddakṣiṇāyanamahāni vardhante yāvadudagayanaṃ rātrayaḥ|| 6||

अर्थ

इस प्रकार दक्षिणायन आरम्भ होनेतक दिन बढ़ते रहते हैं और उत्तरायण लगनेतक रात्रियाँ॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वृषादिषु।

    (मुद्रित पृष्ठ 669)
  2. २

    प्रा० पा०—विवर्धन्ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 669)

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