श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.23.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

एतदु हैव भगवतो विष्णोः सर्वदेवतामयं रूपमहरहः सन्ध्यायां प्रयतो वाग्यतो निरीक्षमाण उपतिष्ठेत नमो ज्योतिर्लोकाय कालायनायानिमिषां पतये महापुरुषायाभिधीमहीति॥ ८॥

etadu haiva bhagavato viṣṇoḥ sarvadevatāmayaṃ rūpamaharahaḥ sandhyāyāṃ prayato vāgyato nirīkṣamāṇa upatiṣṭheta namo jyotirlokāya kālāyanāyānimiṣāṃ pataye mahāpuruṣāyābhidhīmahīti|| 8||

अर्थ

राजन्! यह भगवान् विष्णुका सर्वदेवमय स्वरूप है। इसका नित्यप्रति सायंकालके समय पवित्र और मौन होकर दर्शन करते हुए चिन्तन करना चाहिये तथा इस मन्त्रका जप करते हुए भगवान्‌की स्तुति करनी चाहिये—‘सम्पूर्ण ज्योतिर्गणोंके आश्रय, कालचक्रस्वरूप, सर्वदेवाधिपति परमपुरुष परमात्माका हम नमस्कारपूर्वक ध्यान करते हैं’॥ ८॥✎ 473

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #473 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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