॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.24.29
ततोऽधस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गणः कुहकतक्षककालियसुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्तः पतत्त्रिराजाधिपतेः पुरुषवाहादनवरतमुद्विजमानाः१ स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बसङ्गेन क्वचित्प्रमत्ता विहरन्ति॥ २९॥✎ 954
tato'dhastānmahātale kādraveyāṇāṃ sarpāṇāṃ naikaśirasāṃ krodhavaśo nāma gaṇaḥ kuhakatakṣakakāliyasuṣeṇādipradhānā mahābhogavantaḥ patattrirājādhipateḥ puruṣavāhādanavaratamudvijamānāḥ svakalatrāpatyasuhṛtkuṭumbasaṅgena kvacitpramattā viharanti|| 29||
अर्थ
उसके नीचे महातलमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले सर्पोंका क्रोधवश नामक एक समुदाय रहता है। उनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं। उनके बड़े-बड़े फन हैं। वे सदा भगवान्के वाहन पक्षिराज गरुडजीसे डरते रहते हैं; तो भी कभी-कभी अपने स्त्री, पुत्र, मित्र और कुटुम्बके संगसे प्रमत्त होकर विहार करने लगते हैं॥ २९॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मुद्विग्नमनसा स्वक०।