श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.24.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

तन्‍निशम्योभयत्रापि भगवता रक्षणाय प्रयुक्तं सुदर्शनं नाम भागवतं दयितमस्त्रं तत्तेजसा दुर्विषहं मुहुः परिवर्तमानमभ्यवस्थितो मुहूर्तमुद्विजमानश्‍चकितहृदय आरादेव निवर्तते तदुपरागमिति वदन्ति लोकाः॥ ३॥

tanniśamyobhayatrāpi bhagavatā rakṣaṇāya prayuktaṃ sudarśanaṃ nāma bhāgavataṃ dayitamastraṃ tattejasā durviṣahaṃ muhuḥ parivartamānamabhyavasthito muhūrtamudvijamānaścakitahṛdaya ārādeva nivartate taduparāgamiti vadanti lokāḥ|| 3||

अर्थ

यह देखकर भगवान्‌ने सूर्य और चन्द्रमाकी रक्षाके लिये उन दोनोंके पास अपने प्रिय आयुध सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया है। वह निरन्तर घूमता रहता है, इसलिये राहु उसके असह्य तेजसे उद्विग्न और चकितचित्त होकर मुहूर्तमात्र उनके सामने टिककर फिर सहसा लौट आता है। उसके उतनी देर उनके सामने ठहरनेको ही लोग ‘ग्रहण’ कहते हैं॥ ३॥✎ 475

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #475 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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