श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

श्रीसङ्कर्षणदेवका विवरण और स्तुति

श्रीशुक उवाच

तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृदृश्ययोः सङ्कर्षणमहमित्यभिमानलक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्षते॥ १॥

tasya mūladeśe triṃśadyojanasahasrāntara āste yā vai kalā bhagavatastāmasī samākhyātānanta iti sātvatīyā draṣṭṛdṛśyayoḥ saṅkarṣaṇamahamityabhimānalakṣaṇaṃ yaṃ saṅkarṣaṇamityācakṣate|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर अनन्त नामसे विख्यात भगवान्‌की तामसी नित्य कला है। यह अहंकाररूपा होनेसे द्रष्टा और दृश्यको खींचकर एक कर देती है, इसलिये पांचरात्र आगमके अनुयायी भक्तजन इसे ‘संकर्षण’ कहते हैं॥ १॥✎ 484

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #484 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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