श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्‍नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥ २॥ यस्य ह वा इदं कालेनोपसंजिहीर्षतोऽमर्षविरचितरुचिरभ्रमद्भ्रुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र एकादशव्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन् उदतिष्ठत्॥ ३॥ यस्याङ्‌घ्रिकमलयुगलारुणविशदनखमणिषण्डमण्डलेष्वहिपतयः सह सात्वतर्षभैरेकान्तभक्तियोगेनावनमन्तः स्ववदनानि परिस्फुरत्कुण्डलप्रभामण्डितगण्डस्थलान्यतिमनोहराणि प्रमुदितमनसः खलु विलोकयन्ति॥ ४॥ यस्यैव हि नागराजकुमार्य आशिष आशासानाश्‍चार्वङ्गवलयविलसितविशदविपुलधवलसुभगरुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दनकुङ्कुमपङ्कानुलेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनोन्मथित हृदयमकरध्वजावेशरुचिरललितस्मितास्तदनुरागमदमुदितमदविघूर्णितारुणकरुणावलोकनयनवदनारविन्दं सव्रीडं किल विलोकयन्ति॥ ५॥✎ 955

yasya ha vā idaṃ kālenopasaṃjihīrṣato'marṣaviracitarucirabhramadbhruvorantareṇa sāṅkarṣaṇo nāma rudra ekādaśavyūhastryakṣastriśikhaṃ śūlamuttambhayan udatiṣṭhat|| 3||

अर्थ

प्रलयकाल उपस्थित होनेपर जब इन्हें इस विश्‍वका उपसंहार करनेकी इच्छा होती है, तब इनकी क्रोधवश घूमती हुई मनोहर भ्रुकुटियोंके मध्यभागसे संकर्षण नामक रुद्र प्रकट होते हैं। उनकी व्यूहसंख्या ग्यारह है। वे सभी तीन नेत्रोंवाले होते हैं और हाथमें तीन नोकोंवाले शूल लिये रहते हैं॥ ३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #955 शब्दोंके बीचका स्थान: उदतिष्ठत्॥३॥ → उदतिष्ठत्॥ ३॥

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