॥ श्रीहरिः ॥
स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते॥ ६॥
sa eva bhagavānananto'nantaguṇārṇava ādideva upasaṃhṛtāmarṣaroṣavego lokānāṃ svastaya āste|| 6||
अर्थ
वे अनन्त गुणोंके सागर आदिदेव भगवान् अनन्त अपने अमर्ष (असहनशीलता) और रोषके वेगको रोके हुए वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं॥ ६॥
स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते॥ ६॥
वे अनन्त गुणोंके सागर आदिदेव भगवान् अनन्त अपने अमर्ष (असहनशीलता) और रोषके वेगको रोके हुए वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.25.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 684) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/25/6/