श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

यस्त्विह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचरा कुम्भीपाके तप्ततैलेउपरन्धयन्ति॥ १३॥ यस्त्विह पितृविप्रब्रह्मध्रुक् स कालसूत्रसंज्ञके नरके अयुतयोजनपरिमण्डले ताम्रमये२ तप्तखले उपर्यधस्तादग्न्यर्काभ्यामतितप्यमानेऽभिनिवेशितः क्षुत्पिपासाभ्यां च दह्यमानान्तर्बहिःशरीर आस्ते शेते३ चेष्टतेऽवतिष्ठति परिधावति च यावन्ति पशुरोमाणि तावद्वर्षसहस्राणि॥ १४॥✎ 1066

yastviha pitṛviprabrahmadhruk sa kālasūtrasaṃjñake narake ayutayojanaparimaṇḍale tāmramaye taptakhale uparyadhastādagnyarkābhyāmatitapyamāne'bhiniveśitaḥ kṣutpipāsābhyāṃ ca dahyamānāntarbahiḥśarīra āste śete ceṣṭate'vatiṣṭhati paridhāvati ca yāvanti paśuromāṇi tāvadvarṣasahasrāṇi|| 14||

अर्थ

जो मनुष्य इस लोकमें माता-पिता, ब्राह्मण और वेदसे विरोध करता है, उसे यमदूत कालसूत्र नरकमें ले जाते हैं। इसका घेरा दस हजार योजन है। इसकी भूमि ताँबेकी है। इसमें जो तपा हुआ मैदान है, वह ऊपरसे सूर्य और नीचेसे अग्‍निके दाहसे जलता रहता है। वहाँ पहुँचाया हुआ पापी जीव भूख-प्याससे व्याकुल हो जाता है और उसका शरीर बाहर-भीतरसे जलने लगता है। उसकी बेचैनी यहाँतक बढ़ती है कि वह कभी बैठता है, कभी लेटता है, कभी छटपटाने लगता है, कभी खड़ा होता है और कभी इधर-उधर दौड़ने लगता है। इस प्रकार उस नर-पशुके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षतक उसकी यह दुर्गति होती रहती है॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मये खले।

    (मुद्रित पृष्ठ 688)
  2. ३

    प्रा० पा०—शेतेऽवतिष्ठति।

    (मुद्रित पृष्ठ 688)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1066 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दह्यमानान्त-र्बहि:शरीर → दह्यमानान्तर्बहिःशरीर

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