श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

यस्त्विह वै स्तेयेन बलाद्वा हिरण्यरत्नादीनि ब्राह्मणस्य वापहरत्यन्यस्य वानापदि पुरुषस्तममुत्र राजन् यमपुरुषा अयस्मयैरग्‍निपिण्डैः१ सन्दंशैस्त्वचि निष्कुषन्ति॥ १९॥ यस्त्विह वा अगम्यां स्त्रियमगम्यं वा पुरुषं योषिदभिगच्छति२ तावमुत्र कशया ताडयन्तस्तिग्मया३ सूर्म्या लोहमय्या पुरुषमालिङ्गयन्ति स्त्रियं च पुरुषरूपया४ सूर्म्या॥ २०॥

yastviha vā agamyāṃ striyamagamyaṃ vā puruṣaṃ yoṣidabhigacchati tāvamutra kaśayā tāḍayantastigmayā sūrmyā lohamayyā puruṣamāliṅgayanti striyaṃ ca puruṣarūpayā sūrmyā|| 20||

अर्थ

इस लोकमें यदि कोई पुरुष अगम्या स्त्रीके साथ सम्भोग करता है अथवा कोई स्त्री अगम्य पुरुषसे व्यभिचार करती है, तो यमदूत उसे तप्तसूर्मि नामक नरकमें ले जाकर कोड़ोंसे पीटते हैं तथा पुरुषको तपाये हुए लोहेकी स्त्री-मूर्तिसे और स्त्रीको तपायी हुई पुरुष-प्रतिमासे आलिंगन कराते हैं॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—अश्ममयैरग्‍नि।

    (मुद्रित पृष्ठ 690)
  2. २

    प्रा० पा०—दपि गच्छति।

    (मुद्रित पृष्ठ 690)
  3. ३

    प्रा० पा०—ताडयेत्तिग्मया।

    (मुद्रित पृष्ठ 690)
  4. ४

    प्रा० पा०—पुरुषमूर्त्त्या।

    (मुद्रित पृष्ठ 690)

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