॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.26.22
ये त्विह वै राजन्या राजपुरुषा वा अपाखण्डा धर्मसेतून्५ भिन्दन्ति ते सम्परेत्य वैतरण्यां निपतन्ति भिन्नमर्यादास्तस्यां निरयपरिखाभूतायां नद्यां यादोगणैरितस्ततो भक्ष्यमाणा आत्मना न वियुज्यमानाश्चासुभिरुह्यमानाः स्वाघेन कर्मपाकमनुस्मरन्तो विण्मूत्रपूयशोणितकेशनखास्थिमेदोमांसवसावाहिन्यामुपतप्यन्ते॥ २२॥ ये त्विह वै वृषलीपतयो नष्टशौचाचारनियमास्त्यक्तलज्जाः पशुचर्यां चरन्ति ते चापि प्रेत्य पूयविण्मूत्रश्लेष्ममलापूर्णार्णवे निपतन्ति तदेवातिबीभत्सितमश्नन्ति॥ २३॥
ye tviha vai rājanyā rājapuruṣā vā apākhaṇḍā dharmasetūn bhindanti te samparetya vaitaraṇyāṃ nipatanti bhinnamaryādāstasyāṃ nirayaparikhābhūtāyāṃ nadyāṃ yādogaṇairitastato bhakṣyamāṇā ātmanā na viyujyamānāścāsubhiruhyamānāḥ svāghena karmapākamanusmaranto viṇmūtrapūyaśoṇitakeśanakhāsthimedomāṃsavasāvāhinyāmupatapyante|| 22||
अर्थ
जो राजा या राजपुरुष इस लोकमें श्रेष्ठ कुलमें जन्म पाकर भी धर्मकी मर्यादाका उच्छेद करते हैं, वे उस मर्यादातिक्रमणके कारण मरनेपर वैतरणी नदीमें पटके जाते हैं। यह नदी नरकोंकी खाईके समान है; उसमें मल, मूत्र, पीब, रक्त, केश, नख, हड्डी, चर्बी, मांस और मज्जा आदि गंदी चीजें भरी हुई हैं। वहाँ गिरनेपर उन्हें इधर-उधरसे जलके जीव नोचते हैं। किन्तु इससे उनका शरीर नहीं छूटता, पापके कारण प्राण उसे वहन किये रहते हैं और वे उस दुर्गतिको अपनी करनीका फल समझकर मन-ही-मन सन्तप्त होते रहते हैं॥ २२॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—धर्मसेतुं।