श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.25

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिल्‍ँलोके वैशसे नरके पतितान्‍निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति॥ २५॥

ye tviha vai dāmbhikā dambhayajñeṣu paśūn viśasanti tānamuṣmilm̐loke vaiśase narake patitānnirayapatayo yātayitvā viśasanti|| 25||

अर्थ

जो पाखण्डीलोग पाखण्डपूर्ण यज्ञोंमें पशुओंका वध करते हैं, उन्हें परलोकमें वैशस (विशसन) नरकमें डालकर वहाँके अधिकारी बहुत पीड़ा देकर काटते हैं॥ २५॥

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