॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.26.27
ये त्विह वै दस्यवोऽग्निदा गरदा ग्रामान् सार्थान् वा विलुम्पन्ति राजानो राजभटा वा तांश्चापि हि परेत्य यमदूता वज्रदंष्ट्राः श्वानः सप्तशतानि विंशतिश्च सरभसं खादन्ति॥ २७॥
ye tviha vai dasyavo'gnidā garadā grāmān sārthān vā vilumpanti rājāno rājabhaṭā vā tāṃścāpi hi paretya yamadūtā vajradaṃṣṭrāḥ śvānaḥ saptaśatāni viṃśatiśca sarabhasaṃ khādanti|| 27||
अर्थ
जो कोई चोर अथवा राजा या राजपुरुष इस लोकमें किसीके घरमें आग लगा देते हैं, किसीको विष दे देते हैं अथवा गाँवों या व्यापारियोंकी टोलियोंको लूट लेते हैं, उन्हें मरनेके पश्चात् सारमेयादन नामक नरकमें वज्रकी-सी दाढ़ोंवाले सात सौ बीस यमदूत कुत्ते बनकर बड़े वेगसे काटने लगते हैं॥ २७॥