श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

यत्र ह वाव भगवान् पितृराजो वैवस्वतः स्वविषयं प्रापितेषु स्वपुरुषैर्जन्तुषु सम्परेतेषु यथाकर्मावद्यं दोषमेवानुल्लङ्घितभगवच्छासनः सगणो दमं धारयति॥ ६॥

yatra ha vāva bhagavān pitṛrājo vaivasvataḥ svaviṣayaṃ prāpiteṣu svapuruṣairjantuṣu sampareteṣu yathākarmāvadyaṃ doṣamevānullaṅghitabhagavacchāsanaḥ sagaṇo damaṃ dhārayati|| 6||

अर्थ

उस नरकलोकमें सूर्यके पुत्र पितृराज भगवान् यम अपने सेवकोंके सहित रहते हैं तथा भगवान्‌की आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए, अपने दूतोंद्वारा वहाँ लाये हुए मृत प्राणियोंको उनके दुष्कर्मोंके अनुसार पापका फल दण्ड देते हैं॥ ६॥✎ 488

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #488 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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