॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.3.6
परिजनानुरागविरचितशबलसंशब्दसलिलसितकिसलयतुलसिकादूर्वाङ्कुरैरपि सम्भृतया सपर्यया किल परम परितुष्यसि॥ ६॥
parijanānurāgaviracitaśabalasaṃśabdasalilasitakisalayatulasikādūrvāṅkurairapi sambhṛtayā saparyayā kila parama parituṣyasi|| 6||
अर्थ
किन्तु प्रभो! यदि आपके भक्त प्रेम-गद्गद वाणीसे स्तुति करते हुए सामान्य जल, विशुद्ध पल्लव, तुलसी और दूबके अंकुर आदि सामग्रीसे ही आपकी पूजा करते हैं, तो भी आप सब प्रकार सन्तुष्ट हो जाते हैं॥ ६॥