॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.4.14
भगवानृषभसंज्ञ२ आत्मतन्त्रः स्वयं नित्यनिवृत्तानर्थपरम्परः केवलानन्दानुभव३ ईश्वर एव विपरीतवत्कर्माण्यारभमाणः कालेनानुगतं धर्ममाचरणेनोपशिक्षयन्नतद्विदां सम उपशान्तो मैत्रः कारुणिको धर्मार्थयशः प्रजानन्दामृतावरोधेन गृहेषु लोकं४ नियमयत्॥ १४॥
bhagavānṛṣabhasaṃjña ātmatantraḥ svayaṃ nityanivṛttānarthaparamparaḥ kevalānandānubhava īśvara eva viparītavatkarmāṇyārabhamāṇaḥ kālenānugataṃ dharmamācaraṇenopaśikṣayannatadvidāṃ sama upaśānto maitraḥ kāruṇiko dharmārthayaśaḥ prajānandāmṛtāvarodhena gṛheṣu lokaṃ niyamayat|| 14||
अर्थ
भगवान् ऋषभदेव, यद्यपि परम स्वतन्त्र होनेके कारण स्वयं सर्वदा ही सब प्रकारकी अनर्थपरम्परासे रहित, केवल आनन्दानुभवस्वरूप और साक्षात् ईश्वर ही थे, तो भी अज्ञानियोंके समान कर्म करते हुए उन्होंने कालके अनुसार प्राप्त धर्मका आचरण करके उसका तत्त्व न जाननेवाले लोगोंको उसकी शिक्षा दी। साथ ही सम, शान्त, सुहृद् और कारुणिक रहकर धर्म, अर्थ, यश, सन्तान, भोग-सुख और मोक्षका संग्रह करते हुए गृहस्थाश्रममें लोगोंको नियमित किया॥ १४॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—भगवान्सर्वज्ञ आत्म०।
- ३
प्रा० पा०—केवल आनन्दा०।
- ४
प्रा० पा०—लोकानयमयत्।