जिस समय कर्मवासनाओंके कारण पड़ी हुई इसकी यह दृढ़ हृदय-ग्रन्थि ढीली हो जाती है, उसी समय यह दाम्पत्यभावसे निवृत्त हो जाता है और संसारके हेतुभूत अहंकारको त्यागकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ९॥✎ 4411351
यदा मनोहृदयग्रन्थिरस्य
कर्मानुबद्धो दृढ आश्लथेत।
तदा जनः सम्परिवर्ततेऽस्मा-
न्मुक्तः परं यात्यतिहाय हेतुम्॥ ९
जिस समय कर्मवासनाओंके कारण पड़ी हुई इसकी यह दृढ़ हृदय-ग्रन्थि ढीली हो जाती है, उसी समय यह दाम्पत्यभावसे निवृत्त हो जाता है और संसारके हेतुभूत अहंकारको त्यागकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.5.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 594) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/5/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#441 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में
#1351 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): योग-साधनसे → योगसाधनसे