श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां

दैवं प्रियः कुलपतिः क्‍व च किङ्करो वः।

अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो

मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्॥ १८

rājan patirgururalaṃ bhavatāṃ yadūnāṃ

daivaṃ priyaḥ kulapatiḥ kva ca kiṅkaro vaḥ|

astvevamaṅga bhagavān bhajatāṃ mukundo

muktiṃ dadāti karhicitsma na bhaktiyogam|| 18

अर्थ

राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं पाण्डवलोगोंके और यदुवंशियोंके रक्षक, गुरु, इष्टदेव, सुहृद‍् और कुलपति थे; यहाँतक कि वे कभी-कभी आज्ञाकारी सेवक भी बन जाते थे। इसी प्रकार भगवान् दूसरे भक्तोंके भी अनेकों कार्य कर सकते हैं और उन्हें मुक्ति भी दे देते हैं, परन्तु मुक्तिसे भी बढ़कर जो भक्तियोग है, उसे सहजमें नहीं देते॥ १८॥

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