श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नित्यं ददाति कामस्य च्छिद्रं तमनु येऽरयः।

योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्‍चली॥ ४

nityaṃ dadāti kāmasya cchidraṃ tamanu ye'rayaḥ|

yoginaḥ kṛtamaitrasya patyurjāyeva puṃścalī|| 4

अर्थ

जैसे व्यभिचारिणी स्त्री जार पुरुषोंको अवकाश देकर उनके द्वारा अपनेमें विश्वास रखनेवाले पतिका वध करा देती है—उसी प्रकार जो योगी मनपर विश्वास करते हैं, उनका मन काम और उसके साथी क्रोधादि शत्रुओंको आक्रमण करनेका अवसर देकर उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर देता है॥ ४॥

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